उमर खालिद की जमानत को लेकर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि दोष सिद्ध होने से पहले जमानत मिलना एक अधिकार की तरह होना चाहिए।
चंद्रचूड़ जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में एक कार्यक्रम में पत्रकार वीर सांघवी के 2020 दिल्ली दंगों के साजिश मामले में उमर खालिद की जमानत याचिका को सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किए जाने को लेकर पूछे गए सवाल का जवाब दे रहे थे। उमर खालिद पिछले पांच साल से जेल में हैं।
चंद्रचूड़ ने कहा, ‘मैं अपनी अदालत की आलोचना करने में हिचकिचाता हूं, क्योंकि मैंने एक साल पहले ही इस संस्थान का नेतृत्व किया था। लेकिन ये सिद्धांत कहते हैं कि आप शर्तें लगा सकते हैं, लेकिन तेज ट्रायल सुनिश्चित करना चाहिए। अगर तेज ट्रायल संभव नहीं है तो जमानत नियम होनी चाहिए, अपवाद नहीं।’
चंद्रचूड़ ने कहा, ‘मैं अब जज के रूप में नहीं, बल्कि एक नागरिक के रूप में बोल रहा हूँ। यह दोष सिद्ध होने से पहले जमानत के अधिकार के बारे में है। हमारा कानून निर्दोष होने की धारणा पर आधारित है- हर आरोपी तब तक निर्दोष है, जब तक मुक़दमे में दोषी साबित न हो। ट्रायल से पहले जमानत सजा नहीं हो सकती। अगर कोई व्यक्ति पांच-सात साल जेल में रहता है और फिर बरी हो जाता है तो गँवाए हुए समय की भरपाई कैसे होगी?’
पूर्व सीजेआई ने कहा, ‘अगर कोई सीरियल रेपिस्ट-मर्डरर है, जो सात हत्याओं का आरोपी है, तो वह समाज में बाहर आने पर फिर अपराध कर सकता है। यह जमानत न देने का एक क्लासिक मामला है। दूसरा, अगर जमानत के बाद व्यक्ति ट्रायल में नहीं आता और भाग जाता है। तीसरा, अगर वह सबूतों से छेड़छाड़ करता है। अगर ये तीन अपवाद नहीं लागू होते तो जमानत का नियम होना चाहिए। आज की समस्या यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून साबित होने से पहले निर्दोष नहीं, दोषी मानने पर जोर देते हैं।’
उन्होंने आगे बताया कि अदालतों को जाँच करनी चाहिए कि क्या वाकई राष्ट्रीय सुरक्षा शामिल है और क्या हिरासत जरूरी है। अन्यथा, लोग सालों तक जेल में सड़ते रहते हैं।
चंद्रचूड़ ने आपराधिक न्याय प्रणाली में खामियों को भी गिनाया। उन्होंने कहा कि मुक़दमे सही समय में ख़त्म नहीं होते, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत तेज ट्रायल के अधिकार का उल्लंघन है।
पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर कोई कानून जमानत देने से मना करता है तो भी संविधान सर्वोच्च है। इसलिए अपवादों के बिना जमानत मिलनी चाहिए। हाई कोर्ट और जिला अदालतों की आदत पर चिंता जताई जहां जमानत देने से बचते हैं। उन्होंने कहा कि यह एक चिंताजनक ट्रेंड है।
इसकी वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि देश में अधिकारियों पर आम तौर पर अविश्वास होता है। उन्होंने कहा, “जज सोचते हैं, ‘अगर मैं जमानत दे दूं तो मेरे मक़सद पर सवाल उठेंगे’। वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में जज की ईमानदारी पर शक होता है। बेहतर है कि वे हाई कोर्ट जाएँ। नतीजा यह होता है कि सुप्रीम कोर्ट में हर साल 70000 केस जमा हो जाते हैं।”
उन्होंने कहा, “अगर कोई जिला जज गलत जमानत देता है, जैसे दहेज हत्या के मामले में तो उसे पलट दें। लेकिन नैतिक दबाव न डालें। इससे जजों में डर का माहौल बनता है। हाई कोर्ट की छोटी-सी टिप्पणी करियर बर्बाद कर सकती है, प्रमोशन प्रभावित कर सकती है। यह ट्रायल जजों के मूल्यांकन की समस्या है।”
सुप्रीम कोर्ट के वकील और एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण ने पूर्व सीजेआई के बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, ‘ऐसा पूर्व सीजेआई का कहना है, जिन्होंने उमर खालिद की ज़मानत याचिका जस्टिस बेला त्रिवेदी की बेंच को भेजी थी, जो पहले मोदी की लॉ सेक्रेटरी रह चुकी हैं और मोदी सरकार की इच्छाओं के खिलाफ न जाने के लिए जानी जाती हैं।’
दिल्ली दंगों में कथित “बड़ी साज़िश” मामले में अदालत ने हाल में गुलफिशा फातिमा, शरजील इमाम, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को तो ज़मानत दे दी लेकिन उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)